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त्योहारों पर पापा से मिलने वाली चवन्नी-अठन्नी बहुत याद आ रही...

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 त्योहारों पर पापा से मिलने वाली चवन्नी-अठन्नी बहुत याद आ रही... ----------------------------------------------------------------- दोनों छवियां आज की ही हैं। नवरात्रि व्रत व पितृपक्ष के कारण पिछले एक महीने से दाढ़ी बनी नहीं। पहला चेहरा शेविंग से पूर्व का, दूसरा शेविंग के बाद का....। पापा होते तो दाढ़ीयुक्त चेहरा देख कहते, का रावण घस चेहरा बनाये हौ, शेविंग के बाद का चेहरा देख कहते, देखा कैसा सुंदर और चिक्कन-चिक्कन चेहरा निकल आवा है, भगवान नीक-नीक चेहरा दीहिन है, पता नाहीं कौन-कौन भगल बनाये रहत हैं। पापा नित्य शेविंग करने वाले और स्व-अनुशासन में रहने वाले और अपन की दिनचर्या बेढब व बेतरतीब। पत्रकारिता में आने के बाद तो और बेढंगी। न सोने का निश्चित समय और न उठने का। पर त्योहार में बलरामपुर जरूर हाजिर रहता था। बाहर नौकरी करने वालों को घर की याद बड़ी सताती है। त्योहार ही अवसर होता है जब घर से दूर जीने की सारी कमी पूरी करने की लालसा बनी रहती है। अपना भी यही हाल था, त्योहारों में मम्मी-पापा की छत्रछाया में भाग कर आना। पहले दिन देर तक सोता था। तो पापा बड़बड़ाते, डांटने कि घर आने पर भी साथ न...

मां की डिग्रियां

"माँ की डिग्रियाँ"  -------------------- घर के सबसे उपेक्षित कोने में  बरसों पुराना जंग खाया बक्सा है एक  जिसमें तमाम इतिहास बन चुकी चीजों के साथ  मथढक्की की साड़ी के नीचे  पैंतीस सालों से दबा पड़ा है  माँ की डिग्रियों का एक पुलिन्दा  बचपन में अक्सर देखा है माँ को  दोपहर के दुर्लभ एकांत में  बतियाते बक्से से  किसी पुरानी सखी की तरह  मरे हुए चूहे सी एक ओर कर देतीं  वह चटख पीली लेकिन उदास साड़ी  और फिर हमारे ज्वरग्रस्त माथों सा  देर तक सहलाती रहतीं वह पुलिंदा कभी क्रोध कभी खीझ  और कभी हताश रूदन के बीच  टुकड़े-टुकड़े सुनी बातों को जोड़कर  धीरे-धीरे बुनी मैंने साड़ी की कहानी  कि कैसे ठीक उस रस्म के पहले  घण्टों चीखते रहे थे बाबा  और नाना बस खड़े रह गये थे हाथ जोड़कर  माँ ने पहली बार देखे थे उन आँखों में आँसू  और फिर रोती रही थीं बरसों  अक्सर कहतीं यही पहनाकर भेजना चिता पर  और पिता बस मुस्कुराकर रह जाते... डिग्रियों के बारे में तो चुप ही रहीं माँ  बस एक उकताई सी मुस्कु...

पीड़ा को मुस्कराहटों का पुरस्कार

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25.10.2013 की पोस्ट.. ----------------------------- पीड़ा में मुस्कराने की ताकत देती आवाज --------------------------------------------- मन्ना डे नहीं रहे। कोई हेडिंग बताआे। मेरे एक पत्रकार मित्र का फोन आया। मैं तबीयत खराब होने की वजह से छुट्टी पर था। सवेरे जब डाक्टरों से अपने दांत की चीर-फाड़ कराने जा रहा था तो पत्नी ने सूचना दे दी थी मन्ना डे के नहीं रहने की। उधर, डाक्टरों की आजमाइश चल रही थी और मेरे जेहन में गूंज रहा था मन्ना डे का गाना सुर न सजे...और एे मेरे प्यारे वतन...। पीड़ाएं अपनी जगह होती हैं और उन पर पार पाना आपके हाथ में। आप जब हताश या निराश होते हैं तो संगीत या गाने आपको उबारते हैं। मुस्कराने का शऊर बख्शते हैं। मन्ना डे की आवाज और उनके तमाम गाने हमें यही सिखाते हैं। वैसे तो मन्ना डे पर बहुत लिखा गया और लिखा जाएगा लेकिन मैं यहां सिर्फ उनके काबुलीबाला फिल्म के गाने ‘एे मेरे प्यारे वतन...’ का जिक्र करूंगा। इस गाने के बोल जब—जब कानों में पड़ते हैं तो कदम ठिठक जाते हैं और जेहन आवाज व बोलों के जादू की गिरफ्त में। प्रेम धवन के बोल, सलिल चौधरी की धुन, मन्ना दा की आवाज, क...

शिक्षक दिवस पर विशेष

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अभिवादन, आभार, अभिनंदन, वंदन...डॉ. शुक्ला सर ----------------------------------------------------------------- (शिक्षक दिवस पर विशेष स्मरण) ---------------------------------------- वैसे तो मुझे अपने मां-बाप के अलावा बहुत से शिक्षकों, गुरुओं, व्यक्तियों, व्यक्तित्वों से सीखने को मिला...किंतु मैं निजी तौर पर मानता हूं कि मेरे व्यक्तित्व के विकास में सबसे ज्यादा प्रभाव मेरे टीचर डॉ. वीके शुक्ला जी का रहा...मसलन सामाजिक सेवा के प्रति रुझान, अपनी कमजोरियों पर विजय पाना, कुछ नया करने के लिए एकला चलो की परिपाटी का अनुसरण, कम संसाधनों में भी ज्यादा से ज्यादा परिणाम प्राप्त करना, आलोचनाओं से विचलित नहीं होना, अपने लक्ष्य को पूर्ण किये बिना चैन से न बैठना, बिना संसाधनों के भी बड़े काम कर जाना, अपनी बातों पर दृढ़ रहना, सीखने की ललक बराबर बनाये रखना, टीम के रूप काम करने का अनिवार्य संयम, जिससे जो सीखने को मिले सीख लेना, खुद से ईमानदार रहना, किसी की मदद से पीछे नहीं हटना, सेल्फ डिसिपिलिन..... ------------------------------------------------------------- --------------- इसके अलावा प्रकृ...

कैंसर से संघर्ष -1

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इलाज के दौरान की एक फोटो मैं भी नॉन हॉचकिन लिम्फोमा (एनएचएल) का शिकार बना... ------------------------------------------------------------------- (वर्ल्ड लिम्फोमा डे पर ) ------------------------------------------------------------------- इसमें कोई दो राय कैंसर से संघर्ष ने मेरे नजरिये, मेरी सोच को परिष्कृत किया...चीजों को देखने-समझने की क्षमता में इजाफा हुआ, नयापन आया...खासकर लोगों को माफ करना एवं छोटी से छोटी अच्छी चीज का ऊपरवाले व उस व्यक्ति के प्रति शुक्रिया करने का जज्बा आया...कोई व्यक्ति यदि आपके साथ अच्छा या उपकार कर रहा है तो वह उसका कर्तव्य नहीं है...हम स्वयं को इस लायक बनाते हैं कि लोग या समाज हमारी कमियों को नजरंदाज कर हमारी अच्छाई को याद रखें...ये अच्छे कार्य ही लोगों को आपके प्रति अच्छा करने को प्रेरित करते हैं...अगर आपका व्यवहार अच्छा नहीं होगा तो आप चाहे जितनी बड़ी पदवी पर हों, लोग आपका सम्मान नहीं करेंगे न ही आपके विषम समय में आपके साथ खड़े होंगे... ---------------------------------------------------------------- आसान है सकारात्मक रहने की सलाह देना, उपदेश देना...
खुशियों पर इतराना क्या कमियों पर घबराना क्या अपना क्या बेगाना क्या बात-बात चिल्लाना क्या नाकामी का भी जश्न मनाओ आखिर ग़म से डर जाना क्या सौ मर्जों की एक दवा बस गैरों को ग़म दिखलाना क्या गठरी दुख की भारी भरकम किस्मत का रोना-गाना क्या आज नहीं है, कल फिर होगा तेरी नेमत पर झल्लाना क्या यूं काम अधूरा छोड़ न भागूं मुश्किल वक्त है, डर जाना क्या तेरा साथ तो जीत है पक्की ग़म अंधड़ से घबराना क्या 'पीयूष' की आदत बड़ी निराली हंस-हंस दुख सह जाना क्या. ------------------------------------कुमार पीयूष                                         09.09.2018                                         बलरामपुर, उप्र