पीड़ा को मुस्कराहटों का पुरस्कार
25.10.2013 की पोस्ट.. ----------------------------- पीड़ा में मुस्कराने की ताकत देती आवाज --------------------------------------------- मन्ना डे नहीं रहे। कोई हेडिंग बताआे। मेरे एक पत्रकार मित्र का फोन आया। मैं तबीयत खराब होने की वजह से छुट्टी पर था। सवेरे जब डाक्टरों से अपने दांत की चीर-फाड़ कराने जा रहा था तो पत्नी ने सूचना दे दी थी मन्ना डे के नहीं रहने की। उधर, डाक्टरों की आजमाइश चल रही थी और मेरे जेहन में गूंज रहा था मन्ना डे का गाना सुर न सजे...और एे मेरे प्यारे वतन...। पीड़ाएं अपनी जगह होती हैं और उन पर पार पाना आपके हाथ में। आप जब हताश या निराश होते हैं तो संगीत या गाने आपको उबारते हैं। मुस्कराने का शऊर बख्शते हैं। मन्ना डे की आवाज और उनके तमाम गाने हमें यही सिखाते हैं। वैसे तो मन्ना डे पर बहुत लिखा गया और लिखा जाएगा लेकिन मैं यहां सिर्फ उनके काबुलीबाला फिल्म के गाने ‘एे मेरे प्यारे वतन...’ का जिक्र करूंगा। इस गाने के बोल जब—जब कानों में पड़ते हैं तो कदम ठिठक जाते हैं और जेहन आवाज व बोलों के जादू की गिरफ्त में। प्रेम धवन के बोल, सलिल चौधरी की धुन, मन्ना दा की आवाज, क...