खुशियों पर इतराना क्या
कमियों पर घबराना क्या
अपना क्या बेगाना क्या
बात-बात चिल्लाना क्या
नाकामी का भी जश्न मनाओ
आखिर ग़म से डर जाना क्या
सौ मर्जों की एक दवा बस
गैरों को ग़म दिखलाना क्या
गठरी दुख की भारी भरकम
किस्मत का रोना-गाना क्या
आज नहीं है, कल फिर होगा
तेरी नेमत पर झल्लाना क्या
यूं काम अधूरा छोड़ न भागूं
मुश्किल वक्त है, डर जाना क्या
तेरा साथ तो जीत है पक्की
ग़म अंधड़ से घबराना क्या
'पीयूष' की आदत बड़ी निराली
हंस-हंस दुख सह जाना क्या.
------------------------------------कुमार पीयूष
                                        09.09.2018
                                        बलरामपुर, उप्र

Comments

Popular posts from this blog

मां की डिग्रियां

पीड़ा को मुस्कराहटों का पुरस्कार