त्योहारों पर पापा से मिलने वाली चवन्नी-अठन्नी बहुत याद आ रही...



 त्योहारों पर पापा से मिलने वाली चवन्नी-अठन्नी बहुत याद आ रही...

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दोनों छवियां आज की ही हैं। नवरात्रि व्रत व पितृपक्ष के कारण पिछले एक महीने से दाढ़ी बनी नहीं। पहला चेहरा शेविंग से पूर्व का, दूसरा शेविंग के बाद का....। पापा होते तो दाढ़ीयुक्त चेहरा देख कहते, का रावण घस चेहरा बनाये हौ, शेविंग के बाद का चेहरा देख कहते, देखा कैसा सुंदर और चिक्कन-चिक्कन चेहरा निकल आवा है, भगवान नीक-नीक चेहरा दीहिन है, पता नाहीं कौन-कौन भगल बनाये रहत हैं। पापा नित्य शेविंग करने वाले और स्व-अनुशासन में रहने वाले और अपन की दिनचर्या बेढब व बेतरतीब। पत्रकारिता में आने के बाद तो और बेढंगी। न सोने का निश्चित समय और न उठने का। पर त्योहार में बलरामपुर जरूर हाजिर रहता था। बाहर नौकरी करने वालों को घर की याद बड़ी सताती है। त्योहार ही अवसर होता है जब घर से दूर जीने की सारी कमी पूरी करने की लालसा बनी रहती है। अपना भी यही हाल था, त्योहारों में मम्मी-पापा की छत्रछाया में भाग कर आना। पहले दिन देर तक सोता था। तो पापा बड़बड़ाते, डांटने कि घर आने पर भी साथ नाश्ता-खाना नहीं... जब तक दिनचर्या सुधरती, तब तक जाने का समय हो जाता। न पापा-मम्मी का मन भरता और न अपना। पर रोजी-रोटी का मसले की अपनी जरूरतें होती हैं, घर से बाहर जाना ही पड़ता है। 

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आज दशहरे पर पापा-मम्मी बहुत याद आ रहे हैं। घर का बड़ा होने का एकाकीपन बहुत सालता है। छोटों के लिए बड़े तो होते हैं पर बड़े के लिए मां-बाप के बाद कोई बड़ा नहीं रह जाता। इस दुख का कोई निवारण होता नहीं है। छोटों ने, बच्चों ने ठीक व्यवहार किया तो बड़ों का मान रह जाता है, नहीं तो उपेक्षा व अपमान उनके हिस्से का सहभागी होता ही है। त्योहारों पर पापा द्वारा बचपन में चवन्नी-अठन्नी, फिर रुपया-दो रुपया, पांच-दस, फिर पचास-सौ...शादी के बाद यह रकम पांच सौ हो गई जो श्रीमती के हिस्से में चले जाते थे... आज बहुत याद रहे हैं। वो चवन्नी-अठन्नी बहुत याद रहे हैं, अब कोई हथेली पर आशीर्वाद स्वरूप रखने वाला नहीं...

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सभी को दशहरे की बहुत बधाई व शुभकामनाएं...


#पापा_की_यादें #मम्मी_की_यादें #इश्क़_के_रंग

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