पीड़ा को मुस्कराहटों का पुरस्कार

25.10.2013 की पोस्ट..
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पीड़ा में मुस्कराने की ताकत देती आवाज
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मन्ना डे नहीं रहे। कोई हेडिंग बताआे। मेरे एक पत्रकार मित्र का फोन आया। मैं तबीयत खराब होने की वजह से छुट्टी पर था। सवेरे जब डाक्टरों से अपने दांत की चीर-फाड़ कराने जा रहा था तो पत्नी ने सूचना दे दी थी मन्ना डे के नहीं रहने की। उधर, डाक्टरों की आजमाइश चल रही थी और मेरे जेहन में गूंज रहा था मन्ना डे का गाना सुर न सजे...और एे मेरे प्यारे वतन...।

पीड़ाएं अपनी जगह होती हैं और उन पर पार पाना आपके हाथ में। आप जब हताश या निराश होते हैं तो संगीत या गाने आपको उबारते हैं। मुस्कराने का शऊर बख्शते हैं। मन्ना डे की आवाज और उनके तमाम गाने हमें यही सिखाते हैं। वैसे तो मन्ना डे पर बहुत लिखा गया और लिखा जाएगा लेकिन मैं यहां सिर्फ उनके काबुलीबाला फिल्म के गाने ‘एे मेरे प्यारे वतन...’ का जिक्र करूंगा। इस गाने के बोल जब—जब कानों में पड़ते हैं तो कदम ठिठक जाते हैं और जेहन आवाज व बोलों के जादू की गिरफ्त में। प्रेम धवन के बोल, सलिल चौधरी की धुन, मन्ना दा की आवाज, काबुलीवाले (बलराज साहनी) की अदायगी में अपनी पीड़ाआें की अभिव्यक्ति...। एक करिश्मा जैसे बनता है मन्ना दा की आवाज में दिल में उतरता जाता है।

हम जैसे तमाम कलम के मजदूरों, या रोजगार की तलाश में वेवतन हुए लोग चाहे वह महानगरों में आकर बस गया हो या दूसरे देश चला गया हो...यह गाना ईश्वर के वरदान की तरह है। गाने के एक-एक शब्द, उसकी पीड़ा को आवाज की चाशनी में पगा कर मन्ना दा जिस तरह मन की पीड़ा को जश्न में बदलते हैं, अद्भुत है। खासकर उस गाने का यह बंद...मां का दिल बन के कभी सीने से लग जाता है तू, और कभी नन्हीं सी बेटी बन के याद आता है तू/ जितना याद आता है मुझको, उतना तड़पाता है तू...। परदेश में मां के सीने से लिपटने का सुख और बेटी को कल्पना गोते लगाकर चूमने का सुख का जो अहसास मन्ना दा की आवाज कराती है, वह अवर्णीय है।

इसका एक  और बंद मानो हर परदेशी की पीड़ा और अंतिम इच्छा की अभिव्यक्ति है। छोड़ कर तेरी जमीं को दूर आ पहुंचे हैं हम, फिर भी है ये ही तमन्ना तेरे जर्रों की कसम/ हम जहाँ पैदा हुए, उस जगह ही निकले दम..., परदेश में चाहे जितना हासिल कर लें, पर अपने वतन की मिट्टी की खुशबू, उसमें लोटने और लेटने की इच्छा को मूर्त रूप देती मन्ना दा की आवाज मानो खुद अपने भीतर की आवाजों की प्रतिध्वनि बनकर सामने आ खड़ी होती है।



अब और शायद न लिख सकूं। यह वही मुकाम है जहां अभिव्यक्ति के लिए शब्द कम पड़ते हैं। और हमें मन्ना डे जैसी सुरमई आवाज की जरूरत पड़ती है। कलम के इस नाचीज सिपाही का सुरों के जादूगर को अंतिम प्रणाम...।
शत—शत प्रणाम।
                                               ----कुमार पीयूष
                                                  25.10.2013

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